डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657

(हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

 

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“सर ओटीपी बताइए।“ “नौ दो ग्यारह“ ओटीपी बताने के साथ ही कैब चल पड़ी। थोड़ी देर बाद कैब चालक दूसरे मार्ग की ओर मुड़ने लगा। यह देख मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उसके कैब मोड़ने का कारण पूछा। उसने कहा – “साहब! दूसरा पैसेंजर सड़क के उस पार खड़ा है। उसे चढ़ाते ही कैब फिर से मोड़ दूँगा।“ “भई कमाल करते हो! मैं जानता हूँ कि मैंने शेयरिंग कैब बुक की है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम जहाँ चाहे वहाँ से पैसेंजर को चढ़ाने लगोगे। हाँ अगर हमारे जाने वाले मार्ग में कोई पैसेंजर मिलता है तो चढ़ा लो। लेकिन इस तरह जहाँ चाहे वहाँ से पैसेंजर चढ़ाओगे तो मेरी गाड़ी छूट जाएगी।”

कैब चालक मेरी बात अनसुना कर कैब मोड़ने लगा। उसने दूसरे पैसेंजर को फोन लगाया। पैसेंजर ने पूछा कि अभी तुम्हारे साथ बैठा पैसेंजर औरत है या मर्द। जैसे ही कैब चालक ने मेरा लिंग बताया फट से सामने वाले पैसेंजर ने  बुकिंग कैंसल कर दी। आधा किलोमीटर विपरीत दिशा में जाने और बेफिजूल ट्रैफिक के चलते मेरा आधा घंटा बर्बाद हो गया। ग्राहक छूटने से कैब चालक जितना नहीं चिढ़ा उससे कहीं ज्यादा मेरा दिगाम खराब हो गया।

कैब चालक कहने लगा – “साहब! मेरी ड्यूटी खत्म हुए पूरे दो घंटे हो गए हैं। अब मैं ओवरटाइम कर रहा हूँ। आज के टारगेट में मेरे दो राइड बाकी हैं। अगर राइड पूरा नहीं करूँगा तो कंपनी वाले इंसेटिव्स काट देंगे। अब आप ही बताइए मैं क्या करूँ? हमारी भी कुछ मजबूरियाँ होती हैं। समझने की कोशिश कीजिए।”

तभी कैब चालक किसी को फोन मिलाने लगा। उसने फोन पर कहा – “क्या हुआ रे भई! बुकिंग किया कि नहीं? और कितना समय लगेगा?” यह सुनकर मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। मैंने झल्लाते हुए कहा – “तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या! तुम अपने बंदों को फोन करके बुकिंग करवाने का जो नाटक कर रहे हो, वह किसी और के साथ करना। कंपनी के इंसेटिव्स प्राप्त करने के लिए तुम्हारे चोंचले देखते हुए मुझे शर्म आ रही है। कोई अपने ग्राहक को इस तरह से सताता है क्या? कल की है बात है कि मैं बारिश में खड़ा था। जल्दी से कहीं जाना था। कैब की बुकिंग की, लेकिन कोई आने का नाम ही नहीं ले रहा था। फोन में तो कैब मुझसे पाँच मिनट की दूरी पर बता रहा था, लेकिन चालक था कि घंटा बीत जाने पर भी नहीं आया। तुम्हारे जैसे कैब चालकों के चलते कैब चढ़ने से डर लगने लगा है। मैं तो परेशान हो गया हूँ।”

“साहब! बारिश के समय आपके सौ रुपए वाले भाड़े के लिए कोई बेवकूफ कैब चालक ही आएगा। समझदार चालक तो आपके उल्टा लटक जाने पर भी नहीं आएगा। एक तो बारिश की झिकझिक और ऊपर से ट्रैफिक की मगझमारी।”

“फिर तुम कैब चालक बने ही क्यों? कोई दूसरा धंधा देख लेना था।”

“साहब! पहले पहल कंपनी वाले बहुत मुनाफा देते थे। बाद में कहने लगे कि खुद की गाड़ी होगी तो ही मुनाफा देंगे। इतना ही नहीं कंपनी ने इतने नियम बना दिये हैं कि जीना हराम हो गया है। पैसेंजर को भगवान मानकर सम्मान करना, उन्हें घर तक छोड़ना, कैब चकाचक साफ रखना जैसे लाख टिटिम्मे बना दिए हैं। अब आप ही बताइए नमक-मिर्ची खाने वाले को गुस्सा तो आएगा ही। कभी मुँह से अटपटा निकल जाता है। उधर पैसेंजर हमारी शिकायत करने की देरी है, कंपनी तुरंत हमारा मुनाफा काट लेती है।”

“तो इसमें गलत क्या है? व्यवहार अच्छा होगा तो तुम्हारी सवारियाँ भी तो बढ़ेंगी।”

“साहब हमें सवारियों से ज्यादा इंसेटिव्स कमाने की चिंता रहती है। इसके लिए कभी-कभी पैसेंजर को सताना गुनाह तो नहीं है। हम जो भी करते हैं, सब पेट के लिए करते हैं।”

तभी कैब चालक से भूलवश दुर्घटना घट गयी। तब मैंने कहा – “मेहनत से ज्यादा पैसा चाहोगे तो यही होगा। वैसे इस दुर्घटना का हर्जाना इंसेटिव्स में कवर होगा या नहीं?”

कैब चालक के लटके मुँह से मुझे जवाब मिल गया था।

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