• हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

भाई साहब ऐसे जवाब देने लगे कि मानो मेरे इसी सवाल के लिए कई दिनों से टकटकी लगाए बैठे थे। उन्होंने कहा – आजकल खुद्दम खुदाई का खेला चल रहा है। जो पसंद न आए उनका नाम बदला जा रहा है। अपनों को छोड़ गैरों पर बुल्डोजर चल रहा है। अस्पतालों में ‘तू मर-मैं आया’ का खेला चल रहा है। शराब की दुकानों से सुख और अस्पतालों से दुख खरीदने का धंधा चल रहा है। पुलिस से कम समाचार चैनलों से ज्यादा डराने का खिलवाड़ चल रहा है। चेहरे पर गाय और भीतर से भेडिए का ब्रेकडांस चल रहा है। नौकरी के नाम पर पकौड़ों और चाय का धंधा चल रहा है। कहीं गलाफाड़ने तो कहीं छाती पीटने का संगीत चल रहा है। पेड़ों को काटकर सिलेंडर में हवा भरने का तमाशा चल रहा है। लोगों को कम आंकड़ों को ज्यादा गिनने का तमाशा चल रहा है। कुंभ में डुबकी लगाकर पाप धोने का कहकहा चल रहा है। ऑफलाइन की दुनिया में ऑनलाइन का धमाका चल रहा है। बच्चों पर स्मार्ट होने के नाम पर किताबों से दूर करने वाले ऑनलाइन गेमों का जादू चल रहा है। विपक्ष सरकार के बाल तो सरकार विपक्ष की खाल नोचने की चाल चल रहा है। महंगाई के चलते भुखमरों, बेरोजगारों का शहर छोड़ने तो अमीरों का नए-नए व्यंजन बनाकर यूट्यूब पर लाइक्स के लिए गिड़गिड़ाने का नाटक चल रहा है। कुल मिलाकर देश कछुए की चाल चल रहा है। भई मुझे माफ़ करो! मुझे बख्श दो! लगता है मेरा समय खराब चल रहा है।‘ इतना कहते हुए मैं वहाँ से नौ-दो ग्यारह हो गया।

 डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 

 

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