प्रति माह दो अष्टमी रहती है। कृष्‍ण पक्ष की अष्टमी को मासिक कालाष्टमी और शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मासिक दुर्गा अष्टमी कहते हैं। कालाष्टमी भगवान भैरव को समर्पित है। आओ जानते पंडित कृष्ण मेहता से हैं कि इस बार ज्येष्ठ माह कालाष्टमी कब है। भैरव पूजा के शुभ मुहूर्त, महत्व और मंत्र। कालाष्टमी कब है- अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 22 मई 2022 रविवार को मासिक कालाष्टमी का व्रत रखा जाएगा। कालाष्टमी का शुभ मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त : सुबह 11:28 से 12:22 तकविजय मुहूर्त : दोपहर 02:10 से 03:04 तकगोधूलि मुहूर्त : शाम 06:26 से 06:50 तकनिशिता मुहूर्त : रात्रि 11:34 से 12:16 तक कालाष्टमी का महत्व : पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि कालाष्टमी भगवान भैरव की जयंती तिथि है। इस दिन भैरवनाथ की पूजा करने का महत्व है। अष्टमी तिथि के देवता रुद्र हैं। दोनों पक्षों की 3, 8 और 13 तिथि अर्थात तृतीया, अष्टमी व त्रयोदशी तिथियां जया तिथि कहलाती है। यह तिथियां विद्या, कला, गायन, वादन नृत्य आदि कलात्मक कार्यों के लिए उत्तम मानी गई है। यह तिथि भगवान भैरव से असीम शक्ति प्राप्त करने का समय मानी जाती है अत: इस दिन पूजा और व्रत करने का विशेष महत्व है। काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए रखें कालाष्टमी व्रत, नोट करें पूजा मुहूर्त: कालाष्टमी व्रत के दिन काल भैरव की पूजा की जाती है. उनकी कृपा से रोग, दोष, दुख, भय आदि दूर होते हैं।अकाल मृत्यु का भय भी दूर हो जाता है। पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि काल भैरव की पूजा के लिए कालाष्टमी व्रत उत्तम अवसर है। इस दिन भगवान शिव के रुद्रावतार बाबा भैरवनाथ की पूजा करते हैं। हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी ति​थि को कालाष्टमी व्रत रखते हैं। आज ज्येष्ठ माह प्रारंभ हुआ है। ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी को कालाष्टमी व्रत रखा जाएगा। बाबा काल भैरव की पूजा करने से भय, कष्ट, दुख, पाप, नकारात्मकता आदि दूर होती है। उनके आशीष से शत्रु भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं। वे भगवान भोलेनाथ के क्रोध से उत्पन्न हुए हैं. वे काशी के कोतवाल भी कहे जाते हैं। जो भी बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने काशी जाता है, उसे काल भैरव का भी दर्शन करना होता है। उनके दर्शन के बिना बाबा विश्वनाथ का दर्शन पूरा नहीं होता है।ज्येष्ठ माह के कालाष्टमी व्रत, तिथि और पूजा मुहूर्त के बारे में।ज्येष्ठ कालाष्टमी व्रत पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि हिंदू कैलेंडर के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ मा​ह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 22 मई दिन रविवार को दोपहर 12 बजकर 59 मिनट पर शुरु होगी और यह तिथि 23 मई दिन सोमवार को दिन में 11 बजकर 34 मिनट तक मान्य है। उसके बाद से नवमी तिथि लग जाएगी। ऐसे में अष्टमी की उदयातिथि 22 मई को होगी।इस आधार पर ज्येष्ठ मा​ह का कालाष्टमी व्रत 22 मई को रखा जाएगा।कालाष्टमी पूजा मुहूर्त :पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि22 मई को द्विपुष्कर योग सुबह 05 बजकर 27 मिनट से शुरु होकर दोपहर 12 बजकर 59 मिनट तक है. इंद्र योग सुबह से लेकर अगले दिन 23 मई को प्रात: 03:00 बजे तक है, वहीं धनिष्ठा नक्षत्र रात 10 बजकर 47 मिनट तक है. ये दोनों ही योग और नक्षत्र पूजा पाठ और मांगलिक कार्यों के लिए शुभ हैं।22 मई को सुबह 05:27 बजे से कालाष्टमी व्रत की पूजा कर सकते हैं, वैसे भी बाबा भैरवनाथ तो स्वयं महाकाल हैं, उनकी पूजा के लिए राहुकाल या मुहूर्त आदि देखना एक औपचारिकता है।काल भैरव की पूजा का महत्व: पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि बाबा काल भैरव की पूजा करने से असाध्य रोग दूर होते हैं। उनकी कृपा से अकाल मृत्यु का भय मिट जाता है। काल भैरव को तंत्र मंत्र का देव माना जाता है, उनके आशीर्वाद से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। उनकी पूजा करने से ग्रह दोष भी दूर हो जाते हैं। जिन लोगों को अपने शत्रुओं और विरोधियों से डर रहता है, उनको काल भैरव की पूजा करनी चाहिए।भैरव बाबा को कैसे करें प्रसन्न : इस दिन भगवान बटुक भैरव को कच्चा दूध अर्पित करें।इस दिन भगवान काल भैरव को शराब अर्पित करें। कई लोग इस दिन उन्हें शराब का भोग लगाते हैं। हलुआ, पूरी और मदिरा उनके प्रिय भोग हैं। इसके अलावा इमरती, जलेबी और 5 तरह की मिठाइयां भी अर्पित की जाती हैं। काल भैरव की पूजा विधि पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि इस दिन सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर नित्य-क्रिया आदि कर स्वच्छ हो जाएं। एक लकड़ी के पाट पर सबसे पहले शिव और पार्वतीजी के चित्र को स्थापित करें। फिर काल भैरव के चित्र को स्थापित करें। जल का छिड़काव करने के बाद सभी को गुलाब के फूलों का हार पहनाएं या फूल चढ़ाएं। अब चौमुखी दीपक जलाएं और साथ ही गुग्गल की धूप जलाएं।कुमकुम, हल्दी से सभी को तिलक लगाकर हाथ में गंगा जल लेकर अब व्रत करने का संकल्प लें।अब शिव और पार्वतीजी का पूजन करें और उनकी आरती उतारें। फिर भगवान भैरव का पूजन करें और उनकी आरती उतारें। इस दौरान शिव चालीसा और भैरव चालीसा पढ़ें। ह्रीं उन्मत्त भैरवाय नमः का जाप करें। इसके उपरान्त काल भैरव की आराधना करें। अब पितरों को याद करें और उनका श्राद्ध करें। व्रत के सम्पूर्ण होने के बाद काले कुत्‍ते को मीठी रोटियां खिलाएं या कच्चा दूध पिलाएं। अंत में श्वान का पूजन भी किया जाता है। अर्धरात्रि में धूप, काले तिल, दीपक, उड़द और सरसों के तेल से काल भैरव की पूजा करें।इस दिन लोग व्रत रखकर रात्रि में भजनों के जरिए उनकी महिमा भी गाते हैं।

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