एक पैर कब्र में और एक पैर जमीन पर रखकर चलने वाले दद्दू के साथ पोती जैसी लगने वाली जवाँ लड़की का जोड़ा शहर के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक के पास पहुँचा। जवाँ लड़की की आर्थिक तंगी, घरवालों की मजबूरी और देश के लिंगानुपात की कृपा से रब ने बना दी जोड़ी जैसी बातें किताबों में और बेमेल जोड़ियाँ जमीनों पर फल-फूल रही थीं। दद्दू के साथ शादी, जवाँ लड़की की जिंदगी को सादी, चाहतों को बेमुरादी और जीते जी मरने का आदी बना चुका था। हजारों की भीड़ में चेहरा देखकर मरीज की पहचान करने वाले डॉक्टर कोठियाँ खड़ी करने में देर नहीं लगाते। ऐसे ही एक डॉक्टर के पास दोनों पहुँचे थे। ऊपर से अच्छे दिन सा लगने वाला आदमी भीतर से कई बुरे दिनों का साक्षी होता है। डॉक्टर को मामला समझने में देर नहीं लगी। तुरंत उसने दद्दू को बाहर की सफेद दीवारों से बतियाने के लिए भेज दिया। दूसरी ओर जवाँ लड़की के चेहरे पर अच्छे दिन सी लगने वाले मुस्कुराहट उतार फेंकने और खुलकर बात करने के लिए कहा।

“क्या आप उन्हें दिल से चाहती हैं?”

“दिल किसे कहते हैं, मैं नहीं जानती। वैसे भी दिल से होने वाली शादियों के दिन लद चुके हैं। अब तो केवल समझौते होते हैं।“

“जब आपको यह रिश्ता पसंद नहीं था, तो शादी ही क्यों की?”

“मुझे यह शादी पसंद नहीं थी। लेकिन खेत में गन्ने की फसल तैयार खड़ी हो और समय पर उसे न बेचा जाए तो  आता-जाता उसे चूहने की कोशिश करता है। मेरे संग भी यही हुआ। मुझे गन्ने की तरह औने-पौने दाम में किसी के हाथों बेच दिया गया। वैसे भी यहाँ कौन शादी पसंद-नापसंद से करता है। यहाँ आधी से ज्यादा शादियाँ सर से बोझ उतारने के  लिए की जाती हैं। कुछ समझौते तो कुछ मजबूरियों में कर दी जाती हैं। यहाँ मुझ जैसी कई जवाँ लड़कियाँ हैं जो समझौतों और मजबूरियों के दद्दुओं के नीचे कुचली पड़ी हैं। अगर शादियाँ पसंद से होने लगीं तो आधी आबादी कुंवारी ही मर जाती।”

“इसका मतलब दद्दू जी आपको पत्नी की नजर से नहीं देखते?”

“देखते हैं न! रहने के लिए घर, पहनने के लिए कीमती कपड़े, बदन को सोने-चांदी का उपहार दिया है। उनकी नजरों में स्त्री की परिभाषा यही है। मेरी जैसी स्त्रियाँ आपको हर गली-मुहल्ले में मिल जाएँगी। वाट्सप पर भोजन का वीडियो जो स्वाद देता है वही स्वाद मेरी जिंदगी में दद्दू का है।”

“आप अपना समय कैसे बिताती हैं?”

“रेलवे, बस-स्टैंड पर मिलने वाली किताबों को पढ़कर।”

“वहाँ तो दो कौड़ी की कामुक, वासना और अश्लील किताबें बिकती हैं। ऐसी किताबें क्यों खरीदती हैं?”

“यह सवाल आप मुझसे नहीं लिखने वालों से पूछिए। वैसे भी उन्हीं पुस्तकों के साथ अच्छी किताबें भी बिकती हैं। लेकिन वहाँ वे अश्लील किताबों की तुलना में अल्पसंख्यक कहलाती हैं। वैसे जिसको जो जरूरत होती है आदमी वही पढ़ता है। इस हिसाब से जो किताबें सबसे ज्यादा बिकती हैं, तो समझ जाइए कि उसी की कमी लोगों को अकसर जीवन में खलती है। इस कमी को न दवा पूरा कर सकती है और न कोई दुआ।”

डॉक्टर ने एक लंबी चुप्पी लगाई और उधर जवाँ लड़की दद्दू के संग घर की और लौट पड़ी।

 

                डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा  

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

 

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