“ज़िंदगी की चुनौतियों पर बार-बार बिखरी एक नारी देखो हर ज़ख़्म के साथ कुंदन सी निखरी, थकी नहीं न हारी हर कसौटी पर फ़तेह पाकर ज़िंदगी जीने की उसने कला सीख ली”
जहाँ एक तरफ़ आज भी महिलाओं के लिए कहा जाता है की स्त्री की बुद्धि पैरों की पानी में होती है, वहाँ आज हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी बुद्धिमत्ता और आत्मविश्वास के साथ अपना लोहा मनवा रही है। देश के लिए सचमुच गर्व की बात है एक महिला जो पिछड़े समाज का हिस्सा रही वह अपने आत्मविश्वास और अपने दम पर आज खुद को राष्ट्रपति के पद के लिए प्रस्थापित करने जा रही है। अपनी ज़िंदगी में कई उतार-चढ़ाव से गुज़री द्रौपदी मुर्मू जी एक उम्र तक घर के बाहर शौच जाने के लिए अभिशप्त थी। अब वो भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद की हकदार बन चुकी है। इसके अलावा झारखंड राज्य की पहली महिला राज्यपाल बनने का खिताब इन्हीं के नाम है। अगर भारतीय जनता पार्टी की तरफ से बनी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार जीत जाती है तो पहली बार ऐसा होगा कि कोई आदिवासी महिला भारत देश की पहली राष्ट्रपति बनेगी और भारत की दूसरी महिला राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू बनेंगी।
जो पढ़ना सिर्फ इसलिए चाहती थी कि परिवार के लिए रोटी कमा सकें।
द्रौपदी जी बिना वेतन के शिक्षिका के तौर पर काम कर रही थी, उनको जब ये लगा कि पढ़ने-लिखने के बाद आदिवासी महिलाएं उनसे थोड़ा दूर हो गई हैं तो वो खुद सबके घर जा कर ‘खाने को दे’ कह के बैठने लगीं। जिसने अपने पति और दो बेटों की मौत के दर्द को झेला और बेटे के मौत के बाद तो ऐसे डिप्रेशन में गईं कि लोग कहने लगे कि अब ये नहीं बच पाएंगी पर इन सारी परिस्थितियों से उभरकर वो अब भारत की ‘राष्ट्रपति’ बनने जा रही हैं। बेशक बीजेपी के इस फैसले पर विपक्षियों की भँवें तन गई है। जबकि एक महिला को आगे लाने के फैसले का स्वीकार होना चाहिए था।
जिस गाँव में कहा जाता था राजनीति बहुत खराब चीज है और महिलाएं को तो इससे बहुत दूर रहना चाहिए, उसी गाँव की महिला अब भारत की ‘राष्ट्रपति’ पद के लिए चुनी गई है। जिन्होंने अपना पहला काउंसिल का चुनाव जीतने के बाद जीत का इतना ईमानदार कारण बताया कि ‘वो क्लास में अपना सब्जेक्ट ऐसा पढ़ाती थीं कि बच्चों को उस सब्जेक्ट में किसी दूसरे से ट्यूशन लेने की जरूरत ही नहीं पडती थी इसलिए उनके क्षेत्र के सारे लोग उन्हें बहुत चाहते थे।
2009 में चुनाव हारने के बाद अपनी असफलता की जड़ को तलाशने फिर से गाँव में जा कर रहने लगी और जब वापस लौटी तो अपनी आँखों को दान करने की घोषणा की। एक सरल व्यक्तित्व की धनी द्रौपदी मुर्मू एक राजनेता होने के बावजूद भी ज्यादा संपत्ति की मालकिन नहीं है। उनके पास मात्र मुश्किल से बुरी परिस्थियों में अपने घर को सँभालने लायक संपत्ति है। इसके अलावा ना कोई आभुषण, ना जमीन और ना ही कोई चल और अचल सम्पति।
द्रौपदी मुर्मू जी ये मानती हैं कि जीवन कठिनाइयों का नाम है, हमें ही आगे बढ़ना होगा। कोई पीछे से सहारा नहीं देने वाला। दशकों तक अच्छे कपड़ों और खाने तक से दूर रहने वाले समुदाय को देश के सबसे बड़े ‘भवन’ तक पहुँचा कर भारत ने विश्व को दिखा दिया है कि यहाँ रंग, जाति, भाषा, धर्म, संप्रदाय का कोई भेद नहीं चलता हुनर काबिलियत और आगे बढ़ने का हौसला रखने वाला कोई भी इंसान देश की बागडोर संभाल सकता है। द्रौपदी जी के प्रयासों से उनके गाँव से जुड़े अधिकतर गाँवों में आज लड़कियों के स्कूल जाने का प्रतिशत लड़कों से ज्यादा हो गया है जो एक गर्व की बात है। द्रोपदी मुर्मू को साल 2007 में नीलकंठ पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ विधायक के रूप में प्राप्त हुआ है, यह पुरस्कार उड़ीसा विधानसभा के द्वारा दिया गया था। ऐसी लोखंड़ी महिला द्रौपदी मुर्मू जी का हार्दिक स्वागत है।
भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर

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