सनम रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है। न हाथी है, न घोड़ा है, वहाँ तो पैदल ही जाना है। इन पंक्तियों में जीवन का दर्शन छिपा है। इसके अनुसार हे मनुष्य! क्या होगा तुम्हारी बड़ी-बड़ी कोठियों, घोड़ा-गाड़ी, अकूत संपदा का? क्या तुम फुर्र से उड़ने वाले हवाई जहाज से ऊँचाई और आलीशान कार से चमचमाती सड़कों को नहीं नापना चाहोगे? चले थे मंगल ग्रह में घर बसाने! अब हालात यह है कि बचा-खुचा घर ठीक से संभला नहीं जा रहा है। बताओ तुमसे मिलने, तुम्हें छूने को कौन तैयार है? युगों-युगों तक जात-पात के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर, कभी ऊँच-नीच के नाम पर तो कभी रंग के नाम पर लोगों में भेदभाव करते रहे। उनसे दूरी बनाते रहे। अब कोरोना का किरौना तुम्हारे सभी भेदभावों की पुड़िया बनाकर तुम्हें किसी किरौने की भांति मसल रहा है। जानता हूँ हाई-फाई सोसायटी की चौड़ी सड़कों के दोनों ओर बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें तुम्हारी हैं। तुमने जमीनों के दाम इतने बढ़ा दिये कि गरीब एक छत के लिए मोहताज हो गया है। हजारों एकड़ जमीन दबोचकर बैठे हो, यह जानकर भी कि तुम्हें दफनाने के लिए सिर्फ दो गज़ जमीन की जरूरत है।

पृथ्वी के उत्तरी-दक्षिणी ध्रुव जितनी दूरी वाली रेखा अमीरों और गरीबों  के बीच बन पड़ी है। गरीब सिर्फ गरीब होने के लिए जी रहा है। जबकि अमीर और अमीर होने के लिए। जहरीली चिमनियों का धुआँ मालिकों के घर अमीरी का पर्दा तो गरीबों की जिंदगियों पर कफन बनता जा रहा है। हरियाली का गला घोंटकर कृत्रिम ऑक्सीजन का व्यापार किया जा रहा है। भोजन के नाम पर कैप्सूल, गोलियाँ, वैक्सिन और जल के रूप में ग्लुकोज का सेवन किया जा रहा है। गौर से देखा जाए तो रुपया-पैसा खाया जा रहा है। आत्मीयता के नाम पर दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। किसी को किसी से मिलने की फुर्सत नहीं।चाँद पर पहुँचने वाले हे अहंकारी मनुष्य! अब बताओ क्या तुम बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों से कोरोना रोक सकते हो? क्या आलीशान घोड़ा-गाड़ी, सोना-चाँदी, हीरे-जवाहरात से कोरोना भगा सकते हो? क्या कोरोना को रुपए-पैसों का रिश्वत देकर उसका मृत्यु तांडव समाप्त कर सकते हो? मनुष्य का भेदभाव आज उसकी मौत का कारण बनता जा रहा है। सूट-बूट पहनने वाले के साथ एक तरह का तो गंवारू कपड़े पहनने वाले के साथ दूसरी तरह का बर्ताव किया जा रहा है। अब भी रुपए-पैसे की विषबाला का खेल बदस्तूर जारी है। वह समाज में घर कर चुका है। अमीरों के बदन पर अहंकार बनकर लिपटा पड़ा है। ये अंतर कइयों की अंतर्पीड़ा है। जीते जी मृत्यु की क्रीड़ा है। इदं और अहं के बीच लाचार इड़ा है।  

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा

    

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