डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

टीवी, समाचार पत्रों ने हमें लाख समझाया कि खाने से पहले और खाने के बाद साबून से हाथ धो लिया करो। और हम थे कि इन बातों को हवा करने में अपनी शान समझते थे। हम उसे विज्ञापन कम टाइमपास ज्यादा मानते थे। रिमोट हाथ में होता तो फट से चैनल का टेंटुआ दबा देते और कहते – यह फालतू की बक-बक सुनने की फुरसत किसे है? क्या हमें नहीं पता की हाथ की सफाई क्या होती है? इस देश में लोग कुछ सीखे न सीखे हाथ की सफाई जरूर सीखते हैं। इससे स्वच्छता और संपन्नता दोनों बनी रहती है। ऐसा नहीं है कि सरकारी विज्ञापन हाथ की सफाई के बारे में संविधान जैसी क्लिष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं। भाषा तो सरल है, लेकिन बुद्धि का घड़ा औंधे रखा हो तो कोई बात दिमाग में कैसे घुसे? सो हमने भी इसे समझने की जहमत नहीं की। हमारे हाथ की सफाई के लिए सरकार ने स्वच्छ भारत के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपया फूंक दिया। फिर उन्हीं लाखों-करोड़ों की उगाही के लिए कभी हमसे धूम्र शलाका फुंकवा दिया। तो कभी मुँह में खजांची बना दाने-दाने में केसर ढूँढ़वाने लगा दिया। हिसाब बराबर। तुम अपने घर खुश और हम अपने घर।कहते हैं सबका दिन आता है। सो हाथ की सफाई वाला दिन भी आया। आया तो आया ऐसा आया कि हाथ की सफाई से लेकर मुँह, नाक, आँख या यूँ कहें कि पूरे बदन को साबून से धोने की नौबत आ पड़ी। ऊपर से मुँह और नाक पर चिथड़े का टुकड़ा अलग से। कुछ दिनों तक यह टिटिम्मा भी खूब चला। सबका अंत आता है। मास्क का भी आया। जब कोई वस्तु अति होने लगती है, त उसका पतन भी अति करने वाला ही करता है। कुछ लोग जिंदगी को तपाकर कुंदन बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं तो कुछ महाशय खुद लोगों के क्रंदन से पॉपुलर हो गए। माना कि हाथ की सफाई वाले विज्ञापन का हमने ठीक से पालन नहीं किया। इसका मतलब यह तो नहीं कि हाथ की सफाई के साथ-साथ मुँह, नाक और बदन की सफाई कहीं भारी न पड़ जाए। बैंक भी ब्याज लेता है, लेकिन एक निश्चित दर से। लेकिन यह हाथ की सफाई का ब्याज तो हमारे पल्ले पड़ता ही नहीं। यह ब्याज के एवज में हमसे बदला ले रहा है। हमारे पढ़े-लिखे मूर्ख होने का हर कोई लाभ उठा रहा है।

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