समाचार निर्देश एस डी सेठी – प्राकृतिक आपदा से निपटने में हर साल मोटी राशि खर्च करता है भारत। कार्बन उत्सर्जन के लिए विकसित देश कसूरवार हैं। वहीं कलाईमेट चेंज के लिए विकसित देश भरपाई की बजाये ताकतवर देश जलवायु परिवर्तन का हवाला देकर विकासशील देशों पर ये उल्टे दबाव बनाते रहे हैं कि भारत और चीन जैसे देश कोयले का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। पर इस बार भारत ने ताकतवर देशों को शीशा दिखाया है।. भारत ने जर्मनी के बोन शहर में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित कांफ्रेंस में साफ कह दिया कि विकसित देशों में रहने वाली दुनियां की 10 %आबादी यानि 52 %कार्बन छोडने के लिए जिम्मेदार है। दुनिया के प्रतिष्ठित साईंस जर्नल द लैसेंट के मुताबिक अकेले अमरीका 40%”कार्बन छोडता है। इन्हीं वजहों से दुनियाभर को कलाईमेट चेंज, हीटवेव, बाढ और सूखे का सामना करना पड रहा है। ऐसे हालात से निपटने के लिए भारत में हर साल करीब 7 लाख करोड रूपये खर्च होते हैं। अब इस खर्च की भरपाई की मांग भारत ने रईस देशों से की है। ये अमीर देश कोयले के लिए हमें कसूरवार ठहराते हैं। दरअसल सच ये है कि भारत में हर साल भीषण गर्मी की वजह से 83 हजार लोगों की मौत होती है। वहीं ठंड से हर साल करीब 6.50 लाख लोग ठिठुरकर बेमौत मर जाते हैं। वहीं बाढ, अकाल, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं की वजह और कलाईमेट चेंज के कारण भारत में हर साल 50 लाख लौगों को पलायन करना पडता है। ज्ञात हो कि विकसित देशों ने 2009 में कोपनहेगन समिट में भारत जैसे विकासशील देशों को जुर्माने के बतौर 2020 तक सालाना 7.80 लाख करोड रुपये बतौर हर्जान वा देने का वायदा किया था। इस फंड का इस्तेमाल विकासशील देशों के कार्बन उत्सर्जन को कम करने में किया जाना था। लेकिन विकसित देश अपने वादे से मुकर गए। इसलिए ऐसा नहीं हो सका।

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